विद्युत धारा के रासायनिक प्रभाव (Chemical Effect of Electric Current)
विद्युत धारा के रासायनिक प्रभाव (Chemical Effect of Electric Current)
विद्युत वि लेषण (Electrolysis)
कुछ तरल चालक पदार्थ जैसे गन्धक का अम्ल H,SO, शोरे का अम्ल HNO, और हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCL) और सोडियम हाइड्रोक्साइड NaOH व पोटेशियम हाइड्रोक्साइड KoH आदि क्षार व सोडियम क्लोराइड NaCL, कापर सल्फेट CuSO,, सिल्वर नाइट्रेट AgNO, आदि लवणों के घोल में परमाणु शिथिल रहते हैं। परन्तु जब इनमें विद्युत धारा गुजारी जाती है तो ये पदार्थ अपने आयनों में विघटित होकर एनोड़ और केथोड़ पर पहुंचने लगते हैं। विद्युत धारा द्वारा होने वाली यह विघटन प्रक्रिया विद्युत विश्लेषण कहलाती है और इस प्रक्रिया में उपयोग हुआ घोल जो आयनों में विघटित होता है, विद्युत विश्लेष्य (Electrolyte) कहलाता है।
चित्र -
चित्र 9.1 में विद्युत विश्लेषण के सिद्धान्त को समझने के लिए प्रयास किया गया है। इसमें एक बर्तन में पानी रख कर CuSO, से घोल बनाया गया है और दो ताँबे के इलैक्ट्रोड इस घोल में पूरे डुबोये गए हैं। अब यदि इन इलैक्ट्रोडों को दिष्ट धारा से जोड़ा जाए तो कॉपर सल्फेट विघटित होकर उसके Cu" आयन कैथोड़ की तरफ और SO, आयन एनोड़ की तरफ जाने लगते हैं Cu" आयन कैथोड़ पर जाकर अपना धन आवेश उसे देकर स्वयं Cu परमाणु बन कर कैथोड़ पर ताम्र धातु के रूप में जमने लगता है और So, आयन एनोड़ पर जाकर अपना ऋण आवेश उसे देकर एनोड पर ताम्र से मिल कर दुबारा CuSo, बना देते हैं, इस तरह विद्युत विश्लेष्य की सामर्थ्य तो वैसी ही बनी रहती है परन्तु एनोड़ से ताँबा निकल कर कैथोड़ पर जमने लगता है।
फैराडे के विद्युत विश्लेषण के नियम (Faraday's Laws of Elec. trolysis) :-
प्रथम नियम :-
विद्युत विश्लेषण प्रक्रिया के दौरान किसी इलैक्ट्रोड पर जमा होने वाले या मुक्त होने वाले पदार्थ की मात्रा विद्युत विश्लेष्य में से प्रवाहित होने वाली विद्युत मात्रा के परिमाण के समानुपाती होती है। मान लिया जाए कि
m = इलैक्ट्रोड पर जमा या मुक्त पदार्थ की मात्रा ग्राम मे
m=ZIT
[Q = Ixt = विद्युत मात्रा कूलम्ब में ] यहां पर Z स्थिरांक पदार्थ का विद्युत रासायनिक तुल्यांक कहलाता है। द्वितीय नियम :- 1
यदि समान समय में समान धारा विभिन्न विद्युत विश्लेष्यों में से गुजारी जाये तो विद्युत विश्लेषण के दौरान पदार्थ की जमा होने वाली मात्रा या मुक्त मात्रा विद्युत विश्लेष्यों के विद्युत रासायनिक तुल्यांक भारों के समानुपाती होती है।
[Z = विद्युत रासायनिक तुल्यांक ]
उदाहरण 1 - एक सिल्वर नाइट्रेट के घोल में विद्युत धारा गुजारी गई और इस दौरान 40.248 ग्राम चांदी जमा हुई। चांदी का विद्युत रासायनिक तुल्यांक भार 0.001118 है और समय 1घण्टा लगा तो विद्युत धारा का मान ज्ञात करो ।
विद्युत रासायनिक तुल्यांक (Electro - Chemical Equivalent) :- विद्युत विश्लेषण में किसी कैथोड़ पर जमा होने वाली संहती जो ग्राम में मापी जाती है, यदि उसमें से एक एम्पियर स्थिर दिष्टधारा प्रति सैकिण्ड गुजारी जाए, उस पदार्थ का विद्युत रासायनिक तुल्यांक कहलाती है। इसे Z से दर्शाया जाता है।
उदाहरण के लिए यदि एक सिल्वर नाइट्रेट के घोल में एक कूलम्ब विद्युत मात्रा (एक एम्पियर प्रति सैकिण्ड) गुजारी जाये और कैथोड़ पर 0.001118 ग्राम चाँदी जमा हो जाए तो चाँदी का विद्युत रासायनिक तुल्यांक 0.001118 ग्राम/कूलम्ब होगा।
इलैक्ट्रोड (Electrode) :-
वे चालक प्लेटें जो विद्युत विश्लेष्य में डूबी रहती हैं और जिनमें धारा प्रवेश करती है या निकलती है, इलैक्ट्रोड कहलाती है।
एनोड़ (Anode)
जो प्लेट प्रदाय के धन सिरे से जोड़ी जाती है वह प्लेट एनोड़ कहलाती है।
कैथोड़ (Cathode)
जो प्लेट प्रदाय के ॠण सिरे से जोड़ी जाती है वह कैथोड़ कहलाती है। यदि किसी सेल को प्रदाय से जोड़ा जाए तो धारा इसी कैथोड़ से बाहर निकलती है।
विद्युत विश्लेष्य (Electrolyte) :-
वह तरल पदार्थ जिसमें विद्युत धारा गुजारी जाये और वह अपने आयनों में विघटित हो जाए विद्युत विश्लेष्य कहलाता है।
आयन (lons) :-
विद्युत विश्लेष्य में से विद्युत धारा गुजारने पर पदार्थ के जो अवयव प्राप्त होते हैं, आयन कहलाते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं।
ऋणायन (Anions) :-
जिन आयनों पर ऋण आवेश होता है और विद्युत विश्लेषण के दौरान एनोड़ की तरफ जाते हैं, ऋणायन कहलाते हैं।
घनायन (Cations) :-
जिन आयनों पर धन आवेश होता है और विद्युत विश्लेषण के दौरान जो कैथोड़ की ओर जाते हैं, धनायन कहलाते हैं।
रासायनिक तुल्यांक (Chemical Equivalent) :-
किसी पदार्थ के रासायनिक प्रक्रिया में भाग लेने पर एक कूलम्ब विद्युत मात्रा गुजारने पर एक ग्राम हाइड्रोजन के बदले विमुक्त पदार्थ की संहती उसका रासायनिक तुल्यांक भार कहलाता है।
उदाहरण
2 एक विद्युत विश्लेष्य में एक एम्पियर धारा तीन मिनट बीस सैकिण्ड में गुजारी गई जिसके फलस्वरूप कैथोड़ पर 223. 66 मिली ग्राम चाँदी जमा हुई तो चाँदी का विद्युत रासायनिक तुल्यांक
ज्ञात करें।
हल
समय 1 = 3 मिनट 20 सैकिण्ड = 200 सैकिण्ड
चाँदी की मात्रा m = 223.66 मिलीग्राम
धारा 1 = 1 Ampere
तो फैराडे के नियमानुसार m - ZIt
2.M
It
223.66
1x200×1000
Z - 0.0011183 ग्राम/कूलम्ब उत्तर
विद्युत विश्लेषण के उपयोग (Applications of Electrolysis)
:- विद्युत विश्लेषण के निम्नलिखित उपयोग हैं-
1. विद्युत लेपन
2. विद्युत छपाई 3. धातु शुद्धीकरण 4. धातु निष्कर्षण
5. रासायनिक पदार्थों का उत्पादन 6. विद्युत पॉलिश
7. इलैक्ट्रोलाइटिक कैपेसिटर बनाना।
विद्युत लेपन (Electro Plating)
घटिया धातुओं पर कीमती धातुओं का मुलम्मा (परत) चढ़ाना विद्युत लेपन कहलाता है। इस क्रिया से घटिया धातु सुन्दर और उपयोगी बन जाती है। आजकल इस कार्य का उपयोग बहुत अधिक होने लगा है। लोहे से बने विभिन्न घरेलू सामान जैसे दरवाजे के कुण्डे, हैन्डिल, स्टोव व अन्य उपयोगी सामान सभी इलैक्ट्रोप्लेटिड होते हैं इनमें अधिकतर क्रोमियम की परत अच्छी रहती है और क्रोमप्लेटिड कहलाते हैं।
चित्र 9.2 में विद्युत लेपन की विधि दिखाई गई है। जिस वस्तु पर परत चढ़ानी होती है उसे प्लेटिंग बाथ (वोल्टामीटर) में कैथोड़ बनाया जाता है। जिस धातु की परत चढ़ानी है उसे एनोड बनाते हैं। इस प्रक्रिया में बर्तन में प्रयुक्त विद्युत अपघट्य भी परत चढ़ाने वाली धातु का लवण होता है। उदाहरण के लिए यदि ताँबे की परत चढ़ानी है तो कॉपर सल्फेट का उपयोग किया जाता है। कैथोड़ पर चारों ओर बराबर मोटाई की परत
चढ़ाने के लिए दो एनोड़ प्रयोग किये जाते हैं या कैथोड़ को एनोड के चारो तरफ समान गति से घुमाया जाता है।
विद्युत लेपन करते समय निम्नलिखित सावधानियां अपनानी चाहिए
(i) इस कार्य के लिए कम वोल्टेज और उच्चधारा की दिष्टधारा प्रदाय उपयोग करनी चाहिए।
(ii) जिस पदार्थ पर परत चढ़ानी हो उसे अच्छी तरह साफ करके
कास्टिक सोडे से धोना चाहिए।
(iii) धारा का मान न बहुत अधिक और न बहुत कम होना चाहिए। (iv) एनोड़ और कैथोड़ के बीच की दूरी भी उपयुक्त होनी चाहिए। प्राथमिक सेल (Primary Cell) :-
इन सेलों से शुद्ध दिष्ट धारा प्राप्त होती है और ये सेल ही रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलते हैं। इनको एक बार काम में लेने से इनमें प्रयुक्त इलैक्ट्रोड व इलैक्ट्रोलाइट दोनों खर्च हो जाते हैं, जिसके कारण ये बेकार हो जाते हैं। इसलिए यदि इन्हें दिष्टधारा से चार्ज भी करें तो ये चार्ज नहीं होते।
अच्छे प्राथमिक सेल की विशेषताएँ :-
(i) सेल में स्थानीय क्रिया (Local Action) नहीं होनी चाहिए।
(ii) सेल में उपयोग होने वाले पदार्थ इस प्रकार के होने चाहिए कि इन्हें बार-बार न बदलना पड़े और ये महंगे भी नहीं होने चाहिए।
(iii) सेल का आन्तरिक प्रतिरोध कम होना चाहिए। (iv) सेल में पोलेराइजेशन नहीं होना चाहिए।
प्राथमिक सेल निम्न प्रकार के होते हैं.
(i) सरल वोल्टीय सेल (Simple Valtaic Cell)
(ii) डेनियल सेल (Daniel Cell)
(iii) लैकलांची सेल (Leclanche Cell)
(iv) शुष्क सेल (Dry Cell)
सरल वोल्टीय सेल (Simple Voltaic Cell) :-
चित्र 9.3 में एक सरल वोल्टीय सेल दिखाया गया है जिसमें एक कांच के बर्तन में जिंक व ताँबे के प्लेट इलैक्ट्रोड के रूप में रखे हैं। जिंक इलैक्ट्रोड ;णात्मक प्लेट व ताँबा इलेक्ट्रोड धनात्मक इलैक्ट्रोड का कार्य करता है और ये दोनों इलैक्ट्रोड तनु गन्धक के अम्ल में डूबे हैं। जैसे ही दोनों इलैक्ट्रोड एक साथ तनु गन्धक के अम्ल में रखे जाते हैं तो जस्ते के साथ अधिक क्रिया करता है और ताँबे के साथ कम और यदि इन दोनों इलैक्ट्रोडों के सम्मुख वोल्टमीटर जोड़ दिया जाए तो यह विद्युत वाहक बल को दर्शाता है और यदि इलैक्ट्रोडों को एक तार के साथ रामापी से जोड़ते हुए एक लैम्प या प्रतिरोध से जोड़ते हैं तो धारामापी पाठ्यांक देगा और लैम्प रोशनी देने लगता है। क्योंकि अब जस्ते व ताँबे के इलैक्ट्रोड के बीच रासायनिक अभिक्रिया होने लगती है। तनु गन्धक के अम्ल के अणु अपने आयनों में विघटित हो जाते हैं जो हाइड्रोजन + + व • सल्फेट SO - के आयनों के रूप में होते हैं। हाईड्रोजन आयन व्यावहारिक धारा की दिशा में चलते हैं और ताँबे के इलैक्ट्रोड की सतह पर बुलबुलों के रूप में इकट्ठे होने लगते हैं। जबकि सल्फेट आयन सेल के अन्दर जस्ते के इलैक्ट्रोड की तरफ जाते हैं और जिंक सल्फेट बनाते हैं। व्यवहारिक धारा की दिशा सेल के अन्दर जस्ते से ताँबे की तरफ तथा बाहर ताँबे से जस्ते की ओर होती है। इस सेल का वि.वा. बल 1.1 वोल्ट होता है यह एक तरल पदार्थ सेल कहलाता है।
इस सेल में दो प्रकार के दोष होते हैं जिन्हें स्थानीय क्रिया (Local action) और ध्रुवीकरण (Polarization) कहते हैं।
स्थानीय क्रिया (Local Action) :-
जिंक इलैक्ट्रोड में अशु)ि के कारण यह क्रिया होती है क्योंकि बाजार में जो जिंक मिलता है उसमें लोहे, ताँबे और टिन इत्यादि के कण भी होते हैं। जब बाजारू जिंक का उपयोग सेल में करते हैं तो सेल में इन अशुद्धियों के कारण बहुत सारे लघु सेल बन जाते हैं और जिंक को धीरे-धीरे खर्च कर देते हैं, क्योंकि इन लघु सेलों से सेल के अन्दर ही अन्दर धारा प्रवाहित होने लगती है। इस प्रकार सेल से बगैर किसी काम को लिये बिना सेल अपने आप विसर्जित हो जाता है। यह प्रभाव स्थानीय क्रिया कहलाता है। इस प्रभाव से बचने के लिए जिंक इलैक्ट्रोड के ऊपर पारे के अमलगम की परत चढ़ाते हैं।
ध्रुवीकरण (Polarisation) :-
जब सेल को कार्य में लेते हैं तो जिंक और तनु गन्धक के अम्ल म क्रिया होती है और हाइड्रोजन गैस निकलती है। जो इलैक्ट्रोडों के ऊपर बुलबुलों के रूप में एकत्रित होने लगती है जिसके कारण हाइड्रोजन की पतली परत इलैक्ट्रोड पर छा जाती है जो प्रतिरोध का कार्य करती है। इससे सेल का आन्तरिक प्रतिरोध बढ़ जाता है और उत्पन्न विद्युत वाहक बल भी कम हो जाता है और जल्दी ही सेल निष्क्रिय हो जाता है। यह प्रभाव ध्रुवीकरण कहलाता है। इससे बचने के लिए प्राथमिक सेल में एक ऐसा रसायन उपयोग करना चाहिए जो ऑक्सीजन पैदा करे और ऑक्सीजन
हैं।
• डेनियल सेल (Daniel Cell) :- यह सेल सरल वोल्टीय सेल का सुधरा हुआ रूप है जिसके अन्दर दो प्रकार के तरल पदार्थ उपयोग किये गए हैं। यह वह पहला सेल था जिसमें स्थानीय क्रिया रोकने के लिए अमलगमित • जिंक और ध्रुवीकरण रोकने के लिए डिपोलेराइजर उपयोग किया गया है।
इस सेल का बाहरी बर्तन ताँबे का बना होता है जो धनात्मक इलेक्ट्रोड का कार्य करता है। इस बर्तन में कॉपर सल्फेट का सान्द्र घोल डाला जाता है जो डिपोलेराइजर का कार्य करता है। बर्तन के अन्दर महीन हिदीत बर्तन रखा जाता है जिसमे तनु गन्धक के अम्ल के साथ अमलगमित • जिंक की छड़ रखी जाती है। यह जिक छड़ सेल के लिए नेगेटिव टर्मिनल • अर्थात् नेगेटिव इलैक्ट्रोड का कार्य करती है। सेल में उपस्थित कॉपर सल्फेट के रवे कॉपर सल्फेट घोल की सान्द्रता बनाए रखते हैं।
चित्र - 9.4 डेनियल सेल
जब बाह्य परिपथ के साथ सेल के टर्मिनल जोड़े जाते हैं तो परिपथ में धारा प्रवाहित होने लगती है और पोर्सपोट में रखी जिंक की छड़ गन्धक के अम्ल में घुलने लगती है और हाईड्रोजन विमुक्त होने लगती है। हाईड्रोजन के आयन पोरस में महीन छिद्रों से पास होकर कॉपर सल्फेट के घोल में प्रवेश करते हैं H,SO व तांबे के आयन (Cut) बनाते हैं। 'ये तांबे के आयन तांबे के बर्तन पर जमा होने लगते हैं और ध्रुवणीकरण नहीं होता।
जब सेल से काम नहीं लेना हो तो सेल को खोल कर रखना चाहिए ताकि कॉपर सल्फेट पोरस पोट में प्रवेश करके जिंक से क्रिया न करें, जिसके कारण स्थानीय क्रिया हो सकती है।
इस सेल का आन्तरिक प्रतिरोध लगभग 1.9 से 652 तक तथा
विद्युत वाहक बल 1.12 V के लगभग होता है। यह सस्ता होता है और इसकी वोल्टता स्थिर होती है इसलिए प्रयोगशालाओं में उपयोग होता है।
लैकलांची सेल (Leclanche Cell) :-
इस सेल में काँच के जार में अमोनियम क्लोराइड का घोल डाला जाता है, जिसमें एक तरफ जिंक की छड़ पारे से अमलगमित होकर डूबी रहती है। चित्र 9.5 में दिखाया गया है कि एक महीन छिद्र वाले बर्तन में कार्बन की छड़ पड़ी है जिसके चारों ओर मैंगनीज डाईऑक्साइड तथा कार्बन का चूर्ण मजबूती से पैक किया हुआ होता है। इसमें जिंक छड़ ऋणात्मक इलैक्ट्रोड का कार्य करती है तथा कार्बन छड़ धनात्मक इलैक्ट्रोड का कार्य करती है, अमोनियम क्लोराइड अपघट्य का तथा मैंगनीज डाईऑक्साइड डिपोलेराइजर का कार्य करता है। मैंगनीज डाईऑक्साईड में कार्बन के कण चालकता बढ़ाते हैं। पोर्सपोट में एक छिद्र ऊपर की तरफ बना देते हैं ताकि सेल में बनने वाली गैसें बाहर निकल सके।
जब सेल से कार्य लिया जाता है तो अमोनियम क्लोराइड जिंक से क्रिया करके जिंक क्लोराइड बनाता है और अमोनिया व हाईड्रोजन गैस विमुक्त होती है। चूंकि अमोनिया गैस पानी में घुलनशील होती है और हाईड्रोजन पोर्सपोट में से पास होती हुई मैंगनीज डाईऑक्साईड से क्रिया करके पानी बना देती है।
इस सेल में पोलेराइजेशन से छुटकारा मिलता है परन्तु पूर्ण रूप से नहीं क्योंकि हाईड्रोजन बहुत तेजी से निकलती है जबकि डिपोलेराइजर देर से क्रिया करता है इसलिए कुछ हाईड्रोजन फिर भी कार्बन छड़ के आस-पास जमा हो जाती है। यदि थोड़ा रुक कर सेल को कार्य में लिया जाए तो इस समस्या से छुटकारा मिल सकता है, अतः इस सेल को रुक-रुक कर प्रयोग करना चाहिए।इस सेल का विद्युत वाहक बल 1.45 वोल्ट होता है।
शुष्क सेल (Dry Cell) :-
यह सुवाह्य (Portable) सेल होता है। इसमें विद्युत अपघट्य (Electrolyte) लेई (Paste) के रूप में होता है जिसके कारण इसके रिसने का अन्देशा नहीं रहता इसीलिए इसे लैकलांची सेल का सुधरा हुआ रूप भी कहते हैं।
चित्र 9.6 में शुष्क सेल के भाग दिखाए गए हैं। इसमें एक जिंक का बर्तन होता है जो सेल की नेगेटिव प्लेट का कार्य करता है। सेल की धनात्मक इलैक्ट्रोड का कार्य कार्बन की छड़ करती है जो जिंक के बर्तन के मध्य स्थिर होती है। इस कार्बन छड़ को मैंगनीज डाईआक्साईड व कार्बन के चूर्ण के साथ एक मोटे कपड़े के थैले में रखा जाता है। यह केनवास बैग पोर्सपोट का कार्य करता है। केनवास बैग के बाहर खाली जगह में प्लास्टर ऑफ पेरिस, आटा, साल अमोनियक, जिंक क्लोराइड तथा पानी से बनी लेई भरी जाती है, यह लेई सेल में विद्युत अपघट्य का कार्य करती है। लेई में जिंक क्लोराईड डालने से सेल में नमी बनी रहती है क्योंकि जिंक क्लोराईड वातावरण में से नमी सोख लेता है। सेल का ऊपर वाला हिस्सा लकड़ी के बुरादे से भरा रहता है उस पर पिच कम्पाउंड भर कर सेल को सील कर दिया जाता है इस कम्पाउंड में एक छोटा सा छिद्र कर देते हैं जिसमें से सेल के अन्दर बनने वाली गैसें बाहर निकलती रहती हैं।
सेल का विद्युत वाहक बल लगभग 1.5 वोल्ट और आन्तरिक प्रतिरोध 0.1 से 0.52 तक होता है जो कि लैकलांची सेल से कम होता है। इसकी नेगेटिव प्लेट जो कि एक खोखला बेलन सा होता है, का क्षेत्रफल अधिक होता है। ये सैल साधारणतया रेडियो सैट, ट्रांजिस्टर, टार्च, विद्युत घण्टी, दीवार घड़ी, कैलकुलेटर इत्यादि में बहुतायत से उपयोग होते हैं।
ये सेल विभिन्न आकारों में मिलते हैं जैसे बड़े सेल D प्रकार, C प्रकार मध्यम तथा AA पेन्सिल प्रकार तथा रिमोट में छोटे पेन्सिल AAA प्रकार के उपयोग किए जाते हैं।
लीथियम सेल (Lithium Cell):- इस सेल में ;णात्मक इलैक्ट्रोड लीथियम तथा धनात्मक इलैक्ट्रोड कार्बन का उपयोग किया जाता है और इलैक्ट्रोलाईट के रूप में सल्फर डाईआक्साईड का उपयोग किया जाता है। इस सेल की टर्मिनल वोल्टता 2.5 से 3.6 वोल्ट के मध्य होती है। इसके अतिरिक्त इसकी आयु लगभग 10 वर्ष तथा उच्च ऊर्जा भार अनुपात है जो लगभग 350 WH/Kg तक हो सकता है। यह सेल -50 से +75°c ताप तक कार्य कर सकता है विसर्जित अवस्था में भी इसी वोल्टा इस्तेर रहती है
पारा सेल (Mercury Cell) :-
इस प्रकार के सेल में जस्ता धन टर्मिनल का कार्य करता है जिसमें नीचे मरक्युरिस ऑक्साईड पड़ा रहता है जो डिपोलेराइजर का भी कार्य करता है उसके ऊपर पृथककारी होता है। पृथककारी के ऊपर पोटेशियम हाईड्रोक्साइड होता है जो अपघट्य का कार्य करता है। पोटेशियम हाईड्रोक्साइड के ऊपर चूर्ण के रूप में जिंक होता है जो ;णात्मक इलैक्ट्रोड का कार्य करता है। ये सेल बहुत छोटे बटन के आकार में होते हैं और इनका उपयोग डिजिटल घड़ियों, कैलकुलेटर, श्रव्य साधनों में किया जाता है। चित्र 9.8 मे मरकरी सेल की बनावट दि दिखाई गई है
सिल्वरऑक्साइड सेल
इसकी बनावट भी मरक्यूरिस सेल की तरह होती है। अन्तर केवल
यह होता है कि इसमें एनोड़ मरक्यूरिस ऑक्साइड की अपेक्षा सिल्वर ऑक्साइड होता है। इनकी वोल्टता 1.5 V के लगभग होती है और लघु धार जैसे डिजिटल घड़ी, कैलकुलेटर व छोटे इलैक्ट्रोनिक कार्यों में उपयोग किया जाता है
सेल का आन्तरिक प्रतिरोध
सेल में उपयोग इलैक्ट्रोलाईट तथा इसमें रखे ;णात्मक व धनात्मक इलैक्ट्रोडों के बीच सम्पर्क सतह के कारण जो प्रतिरोध उत्पन्न हो जाता है वह प्रतिरोध सेल का आन्तरिक प्रतिरोध कहलाता है। यह प्रतिरोध प्रत्येक सेल में होता है इसे शून्य नहीं किया जा सकता है, एक अच्छे सेल का आन्तरिक प्रतिरोध कम होना चाहिए। अधिक आन्तरिक प्रतिरोध के कारण सेल की टर्मिनल वोल्टेज कम हो जाती है।
आन्तरिक प्रतिरोध के नियम :-
सामान्य चालक प्रतिरोध के समान ही सेल का आन्तरिक प्रतिरोध निम्न बातों पर निर्भर करता है :
(i) विद्युत परिपथ की लम्बाई
(ii) प्लेटों का अनुप्रस्थ काट क्षेत्रफल
(iii) सेल में प्रयोग किये गए पदार्थों के भौतिक गुण
सेलों का संयोजन (Grouping of Cells):-
सेलों से आवश्यक वोल्टता व धारा प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित तीन तरह से जोड़ा जा सकता है।
(1) श्रेणी संयोजन (Series Connection)
(2) समानान्तर संयोजन (Parallel Connection)
(3) मिश्रित संयोजन (Mixed Connection)
द्वितीयक सेल (Secondary Cells) :-
प्राथमिक सेल को एक बार कार्य में लेने पर यह पुनः आवेशित नहीं किया जा सकता इसके इलैक्ट्रोड व इलैक्ट्रोलाइट दोनों खर्च हो जाते हैं अतः निरन्तर धारा लेने के लिए व उच्च धारा पर कार्य करने वाले विद्युत उपकरणों को स्थिर उच्च दिष्ट धारा सप्लाई की आवश्यकता पड़ती है इस कार्य के लिए द्वितीयक सेल उपयुक्त है। चूँकि द्वितीयक सेल दिष्टधारा उत्पन्न नहीं करते बल्कि ये आवेशन के समय विद्युत ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा के रूप में संचित करते हैं इसलिए इन्हें संचायक (Ac- cumulator) भी कहते हैं और विसर्जन के समय में रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदल कर भार को प्रदाय देते हैं।
दो या दो से अधिक सेलों के संयोजन को बैट्री कहते हैं। बैट्री में
सेल श्रेणी क्रम में जुड़े रहते हैं।
संचायक बैट्री जिसे द्वितीयक सेल भी कहते हैं निम्नलिखित दो प्रकार की होती है।
(a) सीसा अम्ल संचायक (Lead Acid Accumulator)
(b) क्षारीय संचायक (Alkaline Accumulator)
सीसा अम्ल संचायक :-
संरचना - सीसा अम्ल संचायक में निम्नलिखित मुख्य भाग होते हैं -
(1) आधान पात्र (Container) :-
यह बैट्री के अन्दरूनी भागों को आधार देता है और उनकी रक्षा भी करता है। यह कठोर रबर तथा बिटुमनी कम्पाउंड का बना होता है। आज कल P.V.C. के भी आधान पात्र बन रहे हैं।
(2) सेल का ढक्कन (Cell Cover) :-
यह कठोर रबर का बना होता है और सेल के क्रियाशील पदार्थों की जिनमें मध्य छिद्र इलैक्ट्रोलाईट का परीक्षण करने तथा शेष दो छिद्रों में से धूल तथा अन्य बाहरी अशुद्धियों से रक्षा करता है। इसमें तीन छिद्र होते हैं,
सेल के टर्मिनल बाहर निकलते हैं।
(3) सेल संयोजक (Cell Connector) :-
इनका कार्य सेलों को श्रेणी क्रम में जोड़ने का है। सेलों को श्रेणी जोड़ने के लिए इस प्रकार रखा जाता है कि एक सेल के धन सिरे के सामने दूसरे सेल का ऋण सिरा हो। यह लैड से बना होता है।
1. पात्र
2. ऋणात्मक प्लेटों का ब्लॉक
3. धनात्मक टर्मिनल
4. डॉट (Vent Plug)
5. सेल कनेक्टर
6. ऋणात्मक टर्मिनल
7. पृथक्कारी
8.आधारशिराए
(4) छिद्र प्लग (Vent Plug ) :-
यह PVC का बना होता है और इसमें छोटे छिद्र इस प्रकार बने होते हैं कि इनमें से सेल के अन्दर बनने वाली गैसें बाहर आ सकें और अग बाहरी पदार्थ अन्दर न जाए। सेल को चार्ज करते समय इन्हें थोड़ा ढील कर देना चाहिए।
5. प्लेट संयोजक (Plate Connector) :- ये शुद्ध सीसे के बने होते हैं और धनात्मक प्लेटों व ऋणात्मक प्लेटों के समूह को जोड़ते हैं। ऋणात्मक प्लेटों के समूह से निकला सिरा सेल का ऋणात्मक टर्मिनल व धनात्मक प्लेटों के समूह से निकला सिरा सेल का धनात्मक टर्मिनल कहलाता है।
(6) इलैक्ट्रोलाइट (Electrolyte) :-
यह पानी और गन्धक के तेजाब का घोल होता है जिसमें 3 भागशुद्ध पानी और एक भाग गन्धक का अम्ल होता है। साधारणतया घोल का आपेक्षित घनत्व 1.2 होता है। यह घोल विद्युत धारा के लिए चालक का कार्य करता है और सेल की धनात्मक व ऋणात्मक प्लेटें इसमें डूबी रहती हैं।
7:-प्रेथाकारी (Separators)
इन्हें विशेष प्रकार की लकड़ी से बनाया जाता है जिसे रासायनिक विधि से तैयार किया जाता है। इससे इसमें राल व अम्ल प्रभाव समाप्त हो जाते हैं। इनका कार्य ऋणात्मक व धनात्मक प्लेटों को आपस में मिलने से रोकना होता है। इसकी विशेषता यह होती है कि इसमें महीन छिद्र होते हैं जिनमें इलैक्ट्रोलाईट पार हो जाता है, परन्तु प्लेटें आपस में लघु परिपथित नहीं होती।
(8) आधार शिलाएं (Bottom Ribs) :-
सेल के तल में उभरे हुए भागों को तल गुटके या रिब कहते हैं। इन गुटकों के बीच खाली जगह बन जाती है क्योंकि सेल को कार्य में लेते समय प्लेटों से सक्रिय पदार्थ हट कर तल में इकट्ठा होता रहता है जिसके कारण प्लेटों का आपस में लघुपथन होने का खतरा हो जाता है। तल गुटकों के बीच यह सक्रिय पदार्थ इकट्ठा हो जाता है और प्लेटें ऊपर होने के कारण लघु पथ होने से बच जाती है।
(१) धनात्मक प्लेटे (Positive Plates) :-
ये दो प्रकार की होती हैं -
(i) प्लाटें प्रकार
(ii) फारे प्रकार
(i) प्लाटें प्रकार :-
इस प्रकार की प्लेटें बनाने के लिए शुद्ध सीसे की प्लेटों को तनु गन्धक के अम्ल में डुबोकर चार्ज किया जाता है, फिर डिस्चार्ज किया जाता है, फिर चार्ज किया जाता है और यह क्रिया बार-बार दोहराने से एक स्थाई परत प्लेट पर PbO, की बन जाती है। इस प्रकार की प्लेट बनाने में समय अधिक लगता है और महंगी भी पड़ती है अत: व्यवसायिक रूप में इस प्रकार की प्लेटें उपयोग में नहीं लाई जाती है।
(ii) फारे प्लेट :-
यह एक आयताकार सीसे की जाली पर लाल सीसा (Pb,O) की लेई (Paste) डाल कर उस पर दाब डाल कर बनाई जाती हैं। फिर इन्हें सुखा कर कड़ा (Hard) बना लिया जाता है और फिर 1.1 से 1.2 आपेक्षित घनत्व वाले गन्धक के अम्ल में रख कर विद्युत धारा गुजारी जाती है। प्लेटों को धनात्मक सिरे से जोड़ा जाता है और रासायनिक क्रिया में (Pb,O.) से ऑक्सीजन निकल जाती है और Pb, O, PbO, लैड-परॉक्साईड में बदल जाता है।
(10) ऋणात्मक प्लेटें (Negative Plates) :-
ये प्लेटें भी प्लाटें तथा फारे प्रकार की होती है परन्तु व्यावहारिक रूप से ये भी फारे प्रकार की बनाई जाती है परन्तु इनमें Pb, O, की बजाय PbO (लिथार्ज) लिया जाता है। धारा प्रवाहित होने पर PbO की ऑक्सीजन से हाइड्रोजन की क्रिया से पानी बन जाता है और शुद्ध स्पंजदार सीसा Pb बच जाता है। अतः ऋणात्मक प्लेट शुद्ध स्पंजी सीसे की होती है।
कार्य (Working) :-
(1) आवेशन (Charging)
(2) विसर्जन (Discharging)
सीसा अम्ल बैट्री में प्रथम बार आवेशन के समय गन्धक का अम्ल, हाइड्रोजन और SO, आयन में विघटित हो जाता है।
H,SO,→H,*+SO
सल्फेट आयन अस्थिर होने के कारण पानी के साथ क्रिया करके ऑक्सीजन तथा गन्धक का अम्ल बनाते हैं।
So, +H, OH, So +O
सेल में हाइड्रोजन धनावेशित होने के कारण सेल के ऋण इलैक्ट्रोड पर और ऋणात्मक ऑक्सीजन आयन धन इलेक्ट्रोड पर जाते हैं और धनात्मक प्लेट PbO, बन जाती है। Pb+20→PbO2
विसर्जन (Discharging) :-
इस अवस्था में सेल विद्युत धारा देता है जिसकी दिशा बाह्य परिपथ में धनाग्र से ;णाग्र की ओर तथा सेल में ऋणाग्र से धनाग्र की ओर होती है और H, धनायन होते हुए भी धन प्लेट की ओर जाती है और ऑक्सीजन ऋणात्मक प्लेट की ओर तथा निम्नलिखित क्रिया होती हैP2bO, + H2, + H2,SO4, → PbSO4, + 2H2, O
लैंड पराक्साईड + हाइड्रोजन + गन्धक का अम्ल लैड सल्फेट पानी
Pb + SO,=PbSO4
शुद्ध सीसा + सल्फेट लैड सल्फेट
अतः विसर्जन में -
(i) दोनों प्लेटें PbSO, बन जाती हैं।
(ii) सेल में वोल्टेज के मान में कमी आती है।
(iii) पानी बनने से गन्धक के अम्ल का आपेक्षित घनत्व कम हो
(iv) सेल विद्युत ऊर्जा देता है।
पुन: आवेशन (Recharging) :-
धन प्लेट पर
PbSO, + SO + 2H, OPbO2 + 2H,SO,
लैड सल्फेट + सल्फेट + पानी लैड-पराक्साईड
गन्धक का अम्ल
->ऋण प्लेट पर
लैड सल्फेट + हाइड्रोजन
PbSO, + H2Pb + H2SO
अत: पुन: आवेशन में
लैड + गन्धक का अम्ल
(i) धनात्मक प्लेट PbO, गहरे चॉकलेटी भूरे रंग की तथा ऋणात्मक
प्लेट Pb स्लेटी रंग की हो जाती है।
(ii) सेल की वोल्टेज में वृद्धि होती है।
(iii) सेल के इलैक्ट्रोलाइट का आपेक्षित घनत्व बढ़ता है।
(iv) विद्युत ऊर्जा रासायनिक ऊर्जा में संचित हो जाती है।
बैट्री आवेशक (Battery Chargers) :-
ये दो प्रकार के होते हैं।
(1) मोटर जनित्र (Motor Generator Set) :-
इस प्रकार के आवेशक में एक ए.सी. मोटर दिष्ट धारा जनित्र से यान्त्रिक रूप से जुड़ी रहती है। जनित्र दिष्ट धारा उत्पन्न करता है, जनित्र की वोल्टेज इसकी क्षेत्र धारा को नियन्त्रित करके कम या अधिक प्राप्त की जा सकती है। इस सैट से एक बार में कई बैट्री को आवेशित किया जा सकता है।
(2) स्थिर बैट्री चार्जर :-
इस प्रकार के सैट में ट्रांसफार्मर से ए.सी. वोल्टता को कम करके दिष्ट धारा में बदला जाता है। इस कार्य के लिए आजकल अर्द्धचालक युक्ति ब्रिज रेक्टिफायर काम में लिया जाता है। ट्रांसफार्मर से 6, 12, 18, 24, 36, 48 और 72 वोल्ट की टैंपिंग निकाली जाती हैं। इस कार्य में उपयोग हुए दिष्टकारी में निम्न गुण होते हैं -
(ii) स्थान कम घेरते हैं।
(iii) देखभाल कम करनी पड़ती है।
आवेशन विधियां (Methods of Charging) :-
सीसा अम्ल संचायक को कार्य में लेने के पश्चात् आवेशित करना आवश्यक हो जाता है, यदि विसर्जित अवस्था में बैट्री को छोड़ दिया जाये। तो इसकी प्लेटों में अविलय सफेद पदार्थ PbSO, जम जाता है जो प्लेटों को निष्क्रिय बना देता है। सेल को आवेशित करने के लिए निम्नलिखित
दो विधियों को काम में लिया जाता है।
(i) स्थिर धारा आवेशन
(ii) स्थिर वोल्टता आवेशन
(i) स्थिर धारा आवेशन :-
इस विधि का उपयोग अधिकतर मोटर जनित्र सेट में किया जाता है। इसमें जनित्र या प्रदाय के श्रेणी क्रम में हीटर या लैम्प लोड को जोड़ कर बैट्री को सप्लाई दी जाती है। इससे धारा का मान स्थिर हो जाता है और बैट्री स्थिर धारा पर आवेशित होने लगती है। आवेशन धारा का मान कम रखने से सेल में अनावश्यक गैसें नहीं बनती हैं और तापक्रम भी अधि एक नहीं बढ़ता, अतः धारा का मान जितना कम होगा, सेल की दक्षता में वृद्धि होगी।
(ii) स्थिर वोल्टता आवेशन
रेक्टीफायर द्वारा प्राप्त दिष्ट धारा में किया जाता है। चार्जर की वोल्टेज इस विधि का उपयोग अधिकतर ट्रांसफार्मर से वोल्टेज कम करके टेपिंग का चयन करके बैट्री को स्थिर वोल्टता पर आवेशित किया जाता है। चूंकि प्रारम्भ में सेल का विरोधी विद्युत वाहक बल शुन्य होता है। इसलिए शुरू में बैट्री अधिक धारा लेती है। परन्तु ज्यों-ज्यों सेल आवेशित होता जाता है तो सेल सप्लाई से धारा कम लेने लगता है।
इस विधि में बैट्री आवेशित तो जल्दी हो जाती है परन्तु सेल की दक्षता घट जाती है जो बैट्री के लिए अच्छा नहीं है। कम विसर्जित बैट्रियों के लिए यह विधि प्रयोग की जाती है। पूर्ण रूप से आवेशित बैट्री के लक्षण :-
ये लक्षण निम्न प्रकार के हैं।
(1) गैस का निकलना (Gassing) :-
पूरी तरह से चार्ज हुई बैट्री में नेगेटिव इलैक्ट्रोड पर हाइड्रोजन और पोजिटीव इलैक्ट्रोड पर ऑक्सीजन गैस निकलने लगती है जिससे यह पता चलता है कि अब चार्जिग धारा से कोई उपयोगी कार्य नहीं हो रहा है, इस समय चार्जिंग बन्द कर देनी चाहिए।
(2) वोल्टेज में वृद्धि :-
आवेशित अवस्था में सेल की वोल्टता में और अधिक वृद्धि रूक जाती है और प्रत्येक सेल का वि.वा.बल 2.6 वोल्ट हो जाता है।
(3) रंग (Colour) :-
बैट्री के पूर्ण आवेशित होने पर धनात्मक प्लेटों का रंग गहरा भूरा और ऋणात्मक प्लेटों का रंग स्लेटी हो जाता है।
(4) आपेक्षित घनत्व :-
पूरी तरह से चार्ज सेल का आपेक्षित घनत्व 1.21 और डिस्चार्ज सेल का आपेक्षित घनत्व 1.18 होता है। आपेक्षित घनत्व बैट्री हाइड्रोमीटर से देखा जा सकता है। चार्जिंग करते समय शुरू में सेल का आ.घ. घटता है फिर धीरे - धीरे बढ़ना शुरू हो जाता है और अन्त में अधिकतम मान पर पहुंच जाता है।
सेल की दक्षताएं (Efficiencies of a cell) :-
ये निम्न दो प्रकार की हैं।
(1) एम्पियर घण्टा दक्षता (Ampere Hour Efficiency):-
किसी बैट्री द्वारा दी गई ऊर्जा एम्पियर घण्टों में और बैट्री द्वारा ली गई ऊर्जा अर्थात् आवेशित समय में कितने घण्टे तक धारा ली, के अनुपात को एम्पियर घण्टा दक्षता कहते हैं। इसमें वोल्टता का ध्यान नहीं रखा जाता है।
अतः एम्पियर घण्टा दक्षता=एम्पियर घण्टा निर्गत या विसर्जन एम्पियर घण्टा निविष्ट या आवेशन
(2) वाट घण्टादक्षत(WattHourEfficiency)
इस दक्षता में आवेशन व विसर्जन धारा के साथ वोल्टता का भी
ध्यान रखा जाता है, क्योंकि सेल की विसर्जन (Discharging) वोल्टता 2.1 V से 1.8 V तक होती है, परन्तु आवेशन (Charging) 1.8 V से 2.6 V तक बढ़ सकती है अत: यह वाट घण्टा विसर्जन और वाट घण्टा आवेशनका अनुपात होता है।
अत: वाट घण्टा दक्षता. = वाट घण्टा विसर्जन
वाट घण्टा आवेशन
क्योंकि विसर्जन वोल्टता आवेशन वोल्टता से कम होती है अत: वाट घण्टा दक्षता हमेशा एम्पियर घण्टा दक्षता से कम होती है।
सेल की क्षमता (Capacity of a Cell) :-
सेल की क्षमता या धारिता एम्पियर आवर में ली जाती है। इसका अर्थ है कि कोई बैट्री कुछ एम्पियर धारा कुछ घण्टों तक दे सकती है। उदाहरण के लिए 120 AH की क्षमता की बैट्री 30 घण्टे तक 4 एम्पियर धारा दे सकती है। बाजार में प्रचलित नाम प्लेटों की संख्या से भी है। उदाहरण के लिए 15 प्लेट या 25 प्लेट की बैट्री। परन्तु वास्तविक क्षमता एम्पियर घण्टों में होती है। सेल की धारिता निम्नलिखित बातों पर निर्भर करती हैं।
(1) यदि सेल को उच्च धारा पर विसर्जित किया जाए तो सेल की क्षमता घटती है क्योंकि उच्च धारा से आन्तरिक प्रतिरोध के कारण सेल में वोल्टतापात बहुत अधिक हो जाते हैं और प्लेट के छिद्रों में अम्ल की सामर्थ्य दुर्बल हो जाती है जिससे प्लेटों पर रासायनिक क्रियाएं अधिक तेजी से होने लगती हैं।
(2) सेल के विद्युत अपघट्य का घनत्व बढ़ने से सेल की क्षमता बढ़ती है।
(3) तापक्रम बढ़ने से विद्युत अपघट्य का घनत्व बढ़ता है जिसके फलस्वरूप सेल की धारिता बढ़ती है परन्तु आयु कम हो जाती है। कम तापमान से सेल की क्षमता घटती है परन्तु आयु की हानि नहीं होती।
विशेष आवेश (Special Charges) :-
सीसा अम्ल बैट्री की लम्बी आयु और उचित क्षमता के लिए निम्नलिखित आवेश दिये जाते हैं-
(i) ट्रिक्कल चार्जिंग (Trickle Charging) :-
जब बैट्री को काम में न लेना हो, तब भी सेल में स्थानीय क्रिया तथा अन्य खुला परिपथ हानियां होती रहती हैं, इन हानियों के कारण बैट्री धीरे-धीरे विसर्जित होने लगती है और विसर्जित अवस्था में पड़े रहने के कारण खराब हो जाती है। अतः बैट्री को तरोताजा रखने के लिए बहुत कम धारा पर आवेशित होने के लिए छोड़ दिया जाता है इस प्रकार के आवेशन को ट्रिक्कल चार्जिग या टपकन आवेशन कहते हैं।
(ii) तुल्यकारी आवेश (Equalization Charge)
बैट्री को लगातार कार्य में लेते रहने से यह आवश्यक होता है कि इसके सेलों की वोल्टता व आपेक्षित घनत्व बराबर रहे इसके लिए समय-समय पर निम्न आवेशन धारा से आवेशित किया जाता है यह आवेश तुल्यकारी आवेश कहलाता है। प्रतिदिन कार्य में आने वाली बैट्रियों को सप्ताह में एक बार, कम काम में आने वाली बैट्रियों को पन्द्रहवें दिन और बिल्कुल काम में न आने वाली बैट्रियों को माह में एक बार आवेशित किया जाता है।
(ii) बूस्टींग चार्ज (Boosting Charge) :-
जो वाहन बैट्री से चलते हैं उन्हें प्रारम्भिक आवेश के अतिरिक्त वाहन चलते समय कभी-कभी अतिरिक्त आवेश देना पड़ता है जिसका निर्धारण बैट्री की क्षमता, किस्म के आधार पर तय किया जाता है।









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