विद्युत एवं इसके मूल सिद्धांत (Electricity and its Fundamental Laws)



विद्युत एवं इसके मूल सिद्धांत (Electricity and its Fundamental Laws)


परिचय (Introduction)

एवं प्रकाश की तरह विद्युत भी एक प्रकार की ऊर्जा है जो देखाई नहीं देती परन्तु इसकी उपस्थिति इसके प्रभावों से ज्ञात हो जाती रही है और रहेगी इसे नष्ट नहीं किया जा सकता न उत्पन्न किया। किया जाता है। केवल विभिन्न विधियों से इसका रूपान्तरण करके इसका

विधुर के प्रकार (Types of Electricity)

विद्युत दो प्रकार की है।

(i) स्थिर विद्युत (Static Electricity)

(ii) गतिज विद्युत (Dynamic Electricity)

i) स्थिर विद्युत fart firga (Static Electricity)

वैज्ञानिकों के शोध से ज्ञात है कि धातुओं में इलैक्ट्रोन छोड़ने व अधातुओं में इलैक्ट्रोन ग्रहण करने की प्रवृत्ति होती है। अतः यदि कांच को रेशम से रगड़ने पर कांच की छड़ के स्वतन्त्र इलैक्ट्रोन रेशम पर चले कांच पर इलैक्ट्रोन कम होने व प्रोटोन अधिक होने से यह छड़ आवेशित और रेशम ऋण आवेशित हो जाएगी। इसके विपरीत यदि एकोनाइट की छड़ को फलालेन से रगड़ा जाए तो एबोनाइट की छड़ ऋण आशित हो जाएगी और यह ऋण आवेश एबोनाइट की छड़ में तब तक जब तक कि इलैक्ट्रोनों को किसी बाहरी साधन से हटा न दिया जाए। इस प्रकार घर्षण द्वारा उत्पन्न की हुई विद्युत को स्थिर विद्युत Static Electricity कहते हैं। इस प्रकार उत्पन्न विद्युत को बहुत अधिक मात्रा में उत्पन्न नहीं किया जा सकता परन्तु इस प्रभाव से कई प्रकार के उपयन्त्र जाते हैं।

2.विद्युत (Dynamic Electricity)

इसे धारा विद्युत भी कहते हैं और इसे एक स्थान से दूसरे स्थान उत्पादन केन्द्र से सुदूर उपभोक्ता केन्द्र तक तारों व केबलों द्वारा अली से ले जाया जा सकता है। यह अधिक मात्रा में उत्पन्न की जा की है। इसे उत्पन्न करने के लिए निम्नलिखित प्रभावों का उपयोग किसके

है

(1) विद्युत चुम्बकीय प्रेरण द्वारा (Electro Magnetic Induction)

यह विद्युत उत्पन्न करने की सबसे महत्वपूर्ण विधि है और यही एक ऐसी विधि है जिससे सारे व्यावहारिक तथा व्यापारिक कार्यों के लिए आवश्यकतानुसार विद्युत शक्ति उत्पन्न की जा सकती है

 (2) रासायनिक क्रिया द्वारा (By Chemical Action)प्राथमिक सेलों में रासायनिक क्रिया द्वारा विद्युत ऊर्जा उत्पन्न की जा सकती है, परन्तु इसे बहुत अधिक मात्रा में उत्पन्न नहीं किया जा सकता है।

(3) उष्मा के प्रभाव द्वारा (By Heating Effect)

इस विधि में दो विभिन्न पदार्थों जैसे बिस्मथ - एन्टीमनी, ताम्र-लोह, ताम्र-कान्सटेन्टन आदि के सन्धि बिन्दुओं को गर्म करने से बहुत कम विद्युत वाहक बल उत्पन्न होता है। इस प्रकार उत्पन्न विद्युत का उपयोग प्रायः ताप विद्युत उतापमापी (Thermo Electric Pyrometer) में प्रयोग करते हैं। अन्य व्यावहारिक कार्यों के लिए यह विधि उपयोगी नहीं है।

 (4) प्रकाश विद्युत प्रभाव से (By Photo Electric Effect) -इस विधि में प्रकाश की किरणें एक धातु जैसे जस्ते या सीजीयम की सतह पर आपतित की जाती हैं तो धातु में से इलेक्ट्रान निकलते हैं जिसके फलस्वरूप परिपथ में क्षीण विद्युत धारा बहने लगती है। इस विधि का उपयोग सौर ऊर्जा से विद्युत पैदा करने में किया जा रहा है परन्तु यह भी बहुत अधिक मात्रा में पैदा नहीं की जा सकी है। 

इलैक्ट्रोनिक सिॠान्त (Electronic Theory) -आधुनिक इलैक्ट्रान सिॠान्त को ही इलैक्ट्रानिक थ्योरी कहते हैं। कल्पना करें कि सारा ब्रह्ममाण्ड पदार्थ व ऊर्जा से बना है। पदार्थ वह है जो स्थान घेरता है और भार रखता है और ठोस, तरल व गैस के रूप में हो सकता है। पदार्थ छोटे छोटे महीन कणों से मिलकर बना है, इन कणों में पदार्थ के सभी गुण होते हैं और इन्हीं कणों को अणु Molecules कहते हैं। यदि अणु को और छोटे कर्णो में विभाजित किया जाए तो ये विभावित कण परमाणु कहलाते हैं। परमाणु फिर इलैक्ट्रोन प्रोटोन व न्यूट्रोन से बना होता है। ये इलैक्ट्रोन, प्रोटोन तथा न्यूट्रान एक विशेष संरचना में व्यवस्थित रहते हैं, जिसे परमाणु संरचना कहते हैं।

परमाणु संरचना (Atomic Structure)

नाभि (Nucleus)

परमाणु के केन्द्रीय भाग को नाभि कहते हैं। इसमें प्रोटोन व न्यूट्रोन

स्थित रहते है।

प्रोटोन (Protons)

ये कण धनावेशित होते हैं और संख्या में इलैक्ट्रोन के बराबर होते

हैं। यह इलैक्ट्रोन से 1840 गुणा भारी होते हैं।

न्यूट्रोन (Neutrons)

ये कण उदासीन होते हैं इन पर कोई आवेश नहीं होता।

इलैक्ट्रोन (Electrons)

ये भार में बहुत हल्के होते हैं और इन पर ऋण आवेश रहता है। एक

इलैक्ट्रोन की संहति हाइड्रोजन परमाणु की संहति की 1840वीं होती है।



चित्र - 5.1 Electrons revolving in orbits

चित्र 5.1 के अनुसार नाभि के चारों ओर इलैक्ट्रोन निश्चित कक्षाओं में चक्कर लगाते हैं। विभिन्न पदार्थों के परमाणु में इलैक्ट्रोनों की संख्या भी भिन्न-भिन्न होती है। साधारण अवस्था में परमाणु के अन्दर प्रोटोन व इलैक्ट्रोन की संख्या समान होती है और परमाणु उदासीन होता है। बाहरी कक्षा में इलैक्ट्रान अपनी निश्चित कक्षाओं में घुमते हैं। ये नाभि के आकर्षण बल के कारण ही निश्चित कक्षाओं में निश्चित गति से डटे रहते. है। अतः यह सौर मण्डल की तरह जैसे सूर्य के चारों ओर ग्रह चक्कर लगाते है, इलैक्ट्रोन भी नाभि के चारों और चक्कर लगाते रहते हैं।



यदि हाइड्रोजन परमाणु की संरचना पर दृष्टि डालें तो मालूम होगा कि इसकी नाभि में एक प्रोटोन है अतः इसकी कक्षा में भी एक इलैक्ट्रोन ही चक्कर लगा रहा है। यदि हीलियम Helium गैस के परमाणु पर गौर करें तो देखते हैं कि इसकी नाभि में 2 प्रोटोन तथा 2 न्यूट्रोन होते हैं और इसकी बाहरी कक्षा में भी दो इलैक्ट्रोन घूमते हैं। इसी प्रकार यदि तांबे की सरंचना को देखें तो यह ज्ञात होता है कि इसकी नाभि में 29 प्रोटोन तथा 35 न्यूट्रोन हैं और 29 इलैक्ट्रान बाहरी कक्षाओं में घूमते हैं। अत: सभी तुएँ जैसे चांदी, एल्यूमिनियम, तांबा, लोहा इत्यादि पदार्थों के परमाणुओं में प्रोटोन तथा इलैक्ट्रोन हैं परन्तु भिन्न-भिन्न रूप से व्यवस्थित हैं। सभी शुद्ध धातुओं की संरचना पर गौर करें तो पता लगता है कि इनकी सबसे बाहर वाली कक्षा में इलैक्ट्रान, परमाणु की नाभि से बहुत मजबूती से नहीं कम रहता है। बन्धे है, अतः ये इलैक्ट्रोन स्वतन्त्र इलैक्ट्रोन कहलाते हैं। क्योंकि ये इलैक्ट्रान नाभि से सबसे दूर होते हैं, अत: इलैक्ट्रोन व प्रोटोन के मध्य आकर्षण बल

परमाणु के स्वतन्त्र इलैक्ट्रोनों को कुछ मात्रा में ऊर्जा लगाने से आसानी से हटाया जा सकता है। यह इसी प्रकार होता है कि जब कांच की छड़ को रेशम के कपड़े के टुकड़े से रगड़ते है तो इलैक्ट्रोन कांच से रेशम की ओर चले जाते हैं। इस प्रकार कांच की छड़ से इलैक्ट्रान कम हो जाते है अधिक इलैक्ट्रोन के कारण णात्मक आवेशित हो जाती है। है अतः यह धनात्मक आवेश वाली तथा रेशम जो इलैक्ट्रान प्राप्त कर लेती

परमाणु में इलैक्ट्रोन निश्चित प्रकार से व्यवस्थित रहते हैं जो कि निम्न प्रकार है। नाभि के ऊपर स्थित कक्षाओं में प्रथम कक्षा को अक्सर K से द्वितीय को L से, तृतीय को M से तथा आगे N व अन्य अंग्रेजी के अक्षरों से प्रदर्शित करते हैं। कक्षाओं में इलेक्ट्रोन निम्न सूत्र से स्थापित उदाहरण के लिए तांबे के परमाणु में 29 इलेक्ट्रोन है


  


यदि हाइड्रोजन परमाणु की संरचना पर दृष्टि डालें तो मालूम होगा कि इसकी नाभि में एक प्रोटोन है अतः इसकी कक्षा में भी एक इलैक्ट्रोन ही चक्कर लगा रहा है। यदि हीलियम Helium गैस के परमाणु पर गौर करें तो देखते हैं कि इसकी नाभि में 2 प्रोटोन तथा 2 न्यूट्रोन होते हैं और इसकी बाहरी कक्षा में भी दो इलैक्ट्रोन घूमते हैं। इसी प्रकार यदि तांबे की सरंचना को देखें तो यह ज्ञात होता है कि इसकी नाभि में 29 प्रोटोन तथा 35 न्यूट्रोन हैं और 29 इलैक्ट्रान बाहरी कक्षाओं में घूमते हैं। अत: सभी तुएँ जैसे चांदी, एल्यूमिनियम, तांबा, लोहा इत्यादि पदार्थों के परमाणुओं में प्रोटोन तथा इलैक्ट्रोन हैं परन्तु भिन्न-भिन्न रूप से व्यवस्थित हैं। सभी शुद्ध धातुओं की संरचना पर गौर करें तो पता लगता है कि इनकी सबसे बाहर वाली कक्षा में इलैक्ट्रान, परमाणु की नाभि से बहुत मजबूती से नहीं कम रहता है। बन्धे है, अतः ये इलैक्ट्रोन स्वतन्त्र इलैक्ट्रोन कहलाते हैं। क्योंकि ये इलैक्ट्रान नाभि से सबसे दूर होते हैं, अत: इलैक्ट्रोन व प्रोटोन के मध्य आकर्षण बल कम रहता है

परमाणु के स्वतन्त्र इलैक्ट्रोनों को कुछ मात्रा में ऊर्जा लगाने से आसानी से हटाया जा सकता है। यह इसी प्रकार होता है कि जब कांच की छड़ को रेशम के कपड़े के टुकड़े से रगड़ते है तो इलैक्ट्रोन कांच से रेशम की ओर चले जाते हैं। इस प्रकार कांच की छड़ से इलैक्ट्रान कम हो जाते है अधिक इलैक्ट्रोन के कारण णात्मक आवेशित हो जाती है। है अतः यह धनात्मक आवेश वाली तथा रेशम जो इलैक्ट्रान प्राप्त कर लेती है

परमाणु में इलैक्ट्रोन निश्चित प्रकार से व्यवस्थित रहते हैं जो कि निम्न प्रकार है। नाभि के ऊपर स्थित कक्षाओं में प्रथम कक्षा को अक्सर K से द्वितीय को L से, तृतीय को M से तथा आगे N व अन्य अंग्रेजी के अक्षरों से प्रदर्शित करते हैं। कक्षाओं में इलेक्ट्रोन निम्न सूत्र से स्थापित उदाहरण के लिए तांबे के परमाणु में 29 इलेक्ट्रोन है तो ये इस प्रकार व्यवस्थित होते हैं :-

विद्युत धारा (Electric Current)

कि हम जान चुके हैं कि चालकों में बहुत से इलैक्ट्रान स्वतन्त्र

जती है और पादच्छाकी ढंग से चालक के अन्दर एक परमाणु से दूसरे परमाणु जब चालक के सिरों के बीच विभवान्तर लगाया जाता है तो की यदृच्छ हलचल, चालक के साथ-साथ एक व्यवस्थित प्रवाह का रूप ले लेती है। इलैक्ट्रानों के इस प्रवाह को ही विद्युत कहते हैं।

इलैक्ट्रोन ड्रिफ्ट (Electron Drift)

किसी चालक के सिरों पर विभवान्तर लगने पर चालक में स्वतन्त्र ड्रिफ्ट हो सकता है :- का स्थिर प्रवाह ही इलैक्ट्रोन ड्रिफ्ट कहलाता है। निम्न विधियों

(1) घर्षण द्वारा

(ii) उष्मा द्वारा

(iii) चुम्बकत्व द्वारा

(iv) रासायनिक प्रभाव द्वारा

(v) अर्धचालक सतह पर सूर्य किरणें डाल कर ।

इलैक्ट्रोन प्रवाह एवं धारा की व्यावहारिक दिशा (Electron Flow and Conventional Direction of Current)

क्योंकि इलैक्ट्रोन पर ण आवेश होता है इसलिए इनका प्रवाह बाह्य र में हमेशा ;पणा से धन की ओर होता है परन्तु व्यावहारिक रूप से कह परिपथ में धारा की दिशा धन से ;ण की ओर होती है।


चित्र 5.3 में इलैक्ट्रोन प्रवाह की दिशा तथा धारा प्रवाह की हारिक दिशा दिखाई गई है। इलैक्ट्रोन बैट्री के ऋण टर्मिनल से होते बैट्री के धन टर्मिनल पर जाते हैं और बैट्री के अन्दर इलैक्ट्रान ऋणाग्र की ओर बैट्री में रासायनिक क्रिया द्वारा उत्पन्न विद्युत वाहक बल के कारण जाते हैं जबकि व्यावहारिक धारा बैट्री के धन टर्मिनल से शुरू होकर भार प्रतिरोध में से होती हुई बैट्री के ऋण टर्मिनल की ओर जाकर अपना परिपथ पूरा करती है। बैट्री के अन्दर सांकेतिक (व्यावहारिक) धारा की दिशा ऋणाग्र से धनाग्र की ओर है।


विद्युत मात्रा (Electric Quantity)

विद्युत धारा व समय के गुणनफल को विद्युत मात्रा कहते हैं। इसकी इकाई कूलम्ब है। इसे Q से दर्शाया जाता है। एक कूलम्ब में इलैक्ट्रोनों की संख्या 6.29x10 इलेक्ट्रोन होती है। यदि किसी चालक में। एम्पीयर धारा : सैकिण्ड तक प्रवाहित करें तो विद्युत मात्रा Q = It कूलम्ब होगी।


विभव (Potential)

कार्य करवा सकने की शक्ति भी विभव कहलाती है अर्थात् विद्युत विभव उसे कहते हैं कि जो किसी विद्युत परिपथ में किसी बिन्दु की ओर एक इकाई धन आवेश को लाने के लिए जो कार्य विद्युत शक्तियों के विपरीत करना पड़ता है वह विभव कहलाता है। परिपथ में धारा उच्च विभव से निम्न विभव की ओर प्रवाहित होती है।

पृथ्वी का विभव अपरिवर्तित रहता है। यह अन्य वस्तुओं की तुलना में शून्य माना जाता है। इसकी प्रायोगिक इकाई वोल्ट है। यदि किसी चालक में एक कूलम्ब आवेश भेजने पर एक जूल कार्य होता है तो चालक के सिरों पर लगाया हुआ विभव एक वोल्ट होगा।


विभवान्तर (Potential Difference)

किसी परिपथ में चालक अथवा किसी प्रतिरोध के सिरों के बीच लगाये गए विद्युत दाब (Electric Pressure) को विभवान्तर कहते हैं। इस विभवान्तर के कारण ही परिपथ में विद्युत धारा प्रवाहित होती है। विभवान्तर की इकाई वोल्ट है।

विद्युत वाहक बल (Electro Motive Force)

वह बल जो किसी विद्युत परिपथ में इलैक्ट्रोनों को प्रवाहित करने के लिए प्रेरित करता है, विद्युत वाहक बल कहलाता है। ये किसी बैट्री या जनित्र में खुली टर्मिनल वोल्टता होती है जिनको उच्च प्रतिरोध वाले वोल्ट मीटर से माप सकते हैं। वि.वा. बल की इकाई भी वोल्ट होती है।


वोल्टता पात (Voltage Drop)

किसी भी विद्युत युक्ति जैसे प्रतिरोध चालक आदि में धारा प्रवाहित होने पर, धारा तथा उस युक्ति के प्रतिरोध के गुणनफल को उस युक्ति में हुआ वोल्टता पात कहते हैं। यह (IxR) के बराबर होते हैं तथा इनकी इकाई भी वोल्ट होती है।


टर्मिनल वोल्टता (Terminal Voltage)

जब बैट्री या जनित्र पर भार डाल कर उसके टर्मिनल पर वोल्टता मापी जाती है तो यह वोल्टता बैट्री या जनित्र की टर्मिनल वोल्टता कहलाती है। यह बैट्री या जनित्र के वि.वा.बल से उनके आन्तरिक प्रतिरोध में हुए वोल्टता पात घटा कर ज्ञात की जा सकती है। इसे भी वोल्ट में मापते हैं।


उदाहरण के लिए एक बैट्री की खुली परिपथ वोल्टता यदि 2 वोल्ट है, आपूर्ति AC ही होती है। यह एक सैकिण्ड में पचास चक्र प्राप्त करती है।

यदि यह एक बाहरी प्रतिरोध को 2 एम्पीयर धारा दे रही है तो भार पर इसकी टर्मिनल वोल्टता ज्ञात करें। बैट्री का आन्तरिक प्रतिरोध 0.4 ओझ है।

दिया है E - 2 Volt, भार धारा = 2 Ampere

बैट्री का आन्तरिक प्रतिरोध 0.452

r (आन्तरिक वोल्टेज ड्राप) = E-VVolt E-V=Ir

Ir= 2x0.4= 0.8 Volt

अत: V-E- Ir-2-0.8

अतः टर्मिनल वोल्टता V = 1.2 Volt


दिष्ट धारा (Direct Current

वह धारा जो केवल एक ही दिशा में प्रवाहित होती है इसे एक दिशीय धारा भी कहते हैं। यदि इस के रूप को ओसिलोस्कोप से देखें तो एक सोधी सरल रेखा दिखाई देती है। यह प्राथमिक सैल से प्राप्त होती है।


प्रत्यावर्ती धारा (Alternating Current

वह धारा जो समय के साथ अपनी दिशा व मान भी लगातार बदलती है प्रत्यावर्ती धारा कहलाती है। इसे A.C. से दर्शाते हैं और ओसिलोस्कोप से देखने पर इसका रूप ज्या तरंग होता है। घरेलू विद्युत

हमारे देश में सारा विद्युत तन्त्र 50c/s की फ्रिक्वेंसी पर कार्य कर रहा है।


सोल्डरिंग (Soldering)

दो समान धातु के टुकड़ों को या असमान धातु के टुकड़ों को तीसरी धातु जिसे सोल्डर कहते हैं से जोड़ना सोल्डरिंग कहलाता है। यह धातु मिश्र धातु होती है जिसका गलनांक जुड़ने वाली धातु से कम होता है। जब दो धातुओं की सतह को जोड़ा जाता है तो पिघला सोल्डर जुड़ने वाली धातु के रिक्त स्थानों में अन्दर प्रवेश कर जाता है और एक स्थाई मजबूत जोड़ बना देता है जिसकी वैद्युत अविभंगता (Continuity) और यान्त्रिक सामर्थ्य अच्छी होती है।


सोल्डर (Solder)

वैद्युत अभियान्त्रिकी कार्यों में प्रयुक्त सोल्डर टिन व सीसा (Lead) की मिश्र धातु होती है, जिनका अनुपात अलग-अलग कार्यों के लिए अलग-अलग होता है। कई बार गलनांक कम करने के लिए अन्य धातु भी मिलाई जाती है। ये सोल्डर दो प्रकार के होते हैं : नरम सोल्डर तथा कठोर सोल्डर। वस्तुतः वैद्युत व इलैक्ट्रोनिक्स कार्यों में नरम सोल्डर ही प्रयुक्त किया जाता है जिसकी मिलावट निम्न प्रकार होती है :-


सोल्डरिंग की आवश्यकता - जोड़ को यान्त्रिक रूप से दूड़ बनाने के लिए और 100% विद्युत कान्टीन्यूटी प्राप्त करने के लिए जोड़ों

को सोल्डर करना पड़ता है।


Flux) -जैसे किसी भातु की वायु में गर्म किया ऑक्सीजन क्रिया करती है। जिस सतह को गर्म होता है उस पर ऑक्साइड को परत जम जाती है, इस कहते की परत को हटाने के लिए जिस रसायन का प्रयोग किया जाता कहते हैं। ये रसायन आसाइड हटाने वाले तत्व हैं और वाली सतह से ऑकसाइड हटाते हैं और सोल्डर में तरलता हैजिससे जोड़ मजबूत लग जाता है। फ्लक्स का गलनांक सोल्डर के में कम होना चाहिए। फ्लक्स में कोई जंग लगाने वाला पदार्थ होना चाहिए। रेजिन सबसे सुरक्षित पदार्थ हैं जो विद्युत कार्यों के जोड़ के लिए सुरक्षित है। लिए उतम है। फ्लक्स लेई के रूप में भी उपलब्ध है जो कि विद्युत

फ्लक्स के प्रकार (Types of Fluxes) - अलग - अलग की प्रकृति के अनुसार फ्लक्स का चयन किया जाता है। वैधुतिक के लिए अम्ल वाले फ्लक्स उपयोग नहीं किये जाते हैं। ये निम्न प्रकार के पाये जाते हैं।

1. जिंक क्लोराइड (Zine Chloride)

2. अमोनियम क्लोराइड (Ammonium Chloride)

3. बिरोजा (Resin)

4. सुहागा (Borex)

5. जैतून का तेल (Olive Oil)


विभिन्न फ्लक्स के उपयोग

विद्युत कार्यों की सोल्डरिंग विधि (Electrical Job Soldering)

विद्युत के कार्यों में टांका अक्सर नरम सोल्डर से लगाया जाता है, किनमें मुख्य मुख्य विधियाँ निम्न प्रकार हैं :-


(1.) वैद्युत काहिया द्वारा (By Electric Soldering Iron) (2.) ब्लो लैम्प द्वारा (By Blow Lamp)

(3.) सोल्डरिंग पोट व कलछी द्वारा (By Soldering Pot and Ladie)


वैत काहिया द्वारा - वह विद्युत धारा द्वारा गर्मी प्राप्त करने के पर कार्य करता है। इसमें नाइक्रोम से बना हीटिंग एलीमेन्ट होता है। मध्य तांबे की बिट एक छड़ के आकार में होती है जो माईका लेशन के साथ कसी हुई होती है। जैसे ही हीटिंग एलीमेन्ट को सप्लाई से हते है तो इसमें उष्मा उत्पन्न होती है जिससे बीच में रखी तांबे की बिट भी जाती है। इस बिट को ही सोल्डरिंग करने के लिए उपयोग में लेते हैं।

साफ करके टिन करते हैं और फिर कार्य पर प्रयोग करते जोड़ लगाने के लिए आवश्यक है कि बिट साफ होनी चाहिए और इ नहीं होने चाहिए। कार्य में लेते समय इसे लोहे के तार से बने ही रखना चाहिए और यह भी ध्यान रखन चाहिए कि गर्म अवस्था इसको सप्लाई लोड पर न जाए क्योंकि इससे इन्सुलेशन जल कर सम्पर्क हो सकता है और कोई भी दुर्घटना हो सकती है।


ब्लो लैम्प दुआरा टांका लगाना

ब्लो लैम्प का उपयोग बड़े जोड़ों को सोल्डर करने में या लग (Lug) इत्यादि को केबल के सिरों से जोड़ने के लिए किया जाता है। सर्वप्रथम जोड़ को ब्लो लैम्प की नीली लौ में चारों ओर से गर्म करें फिर जोड़ पर उपयुक्त फ्लक्स लगाएँ और फिर नरम सोल्डर की छड़ को जोड़ पर लगाएँ। इस दौरान जोड़ पर न तो अधिक आंच होनी चाहिए और न ही कम, क्योंकि कम ताप पर सोल्डर पूरी तरह से नहीं पिघलेगा और अधिक ताप पर सोल्डर बह जाता है।

तांबे या एल्यूमिनियम के लग को सोल्डरिंग करने के लिए सर्वप्रथम लग को गर्म करें, फिर इसमें उपयुक्त फ्लक्स डालें और फिर नरम सोल्डर छड को लग में रख गर्म होने दें। थोडी देर में सोल्डर पिघल कर लग में भर जाता है। इसी समय केबल के गर्म सिरे को लग में डाल दें और तुरन्त गीले कपड़े से लग को ठण्डा कर दें। यह कार्य शीघ्रता से करना होता है। यदि लग में केबल चालक डालने में देरी की तो सोल्डर ठण्डा हो जाता है और जोड़ नहीं लग पाता है।

एल्यूमिनियम का जोड़ सोल्डर करना (Soldering on Aluminium Joints)

एल्यूमिनियम जोड़ पर सोल्डरिंग थोड़ी सावधानी से करनी पडती है। इसके लिए सोल्डर एल्का पी या एल्का जेड होता है यह 160°C पर पिघल जाता है, इसके अतिरिक्त इसके लिए फ्लक्स भी Eyre No. 7 लिया जाता है।

सर्वप्रथम एल्यूमिनियम के जोड़ से तेल, ग्रीस हटा कर रेगमाल से साफ करके तुरन्त फ्लक्स लगा देना चाहिए अन्यथा एल्युमिनियम सतह पर ऑक्साइड की परत जम सकती है। अब ब्लो लैम्प या सोल्डरिंग आयरन से जोड़ को गर्म करें और पिघला हुआ सोल्डर जोड़ पर डालें और सोल्डर को पूरे जोड़ पर समान रूप से फैला दें और फिर भीगे कपड़े से जोड़ ठण्डा कर दें।


सावधानियाँ

(i) जोड़ की सतह चिकनाई रहित और साफ होनी चाहिए। (ii) जोड़ पर टांका सफेद, चमकदार और समरूप होना चाहिए। (iii) जोड़ पर्याप्त गर्म होना चाहिए।

(iv) फालतू सोल्डर को जोड़ से हटा देना चाहिए। एल्यूमिनियम सोल्डर के प्रकार :-

1. ALCAP Solder सीसा 51

टिन - 31


पिघले सोल्डर का पुन: उपयोग - प्रेक्टीकल कार्यों में सोल्डर को बार-बार गर्म करने से, सोल्डरिंग के दौरान सोल्डर में टिन की मात्रा कम हो जाती है। जिसका कारण यह है कि पिघले सोल्डर की सतह पर टिन मैल के रूप में जम जाता है, दूसरा कारण यह है कि टिन का गलनांक कम होता है जिसके कारण उच्च तापमान पर यह आक्सीकृत हो जाता है।

इसलिए जब भी सोल्डर को गर्म किया जाये तब प्रत्येक क्रिया में थोड़ी दिन की मात्रा मिला देनी चाहिए।

यदि सोल्डर अधिक देर तक गर्म रहे तो मिलाये गये टिन की मात्रा को भी बढ़ा देना चाहिए।


प्रतिरोधक :- इलैक्ट्रोनिक्स परिपथों में सबसे अधिक उपयोग प्रतिरोधकों का होता है। ये निष्क्रिय घटक होते है। इनके उपयोग से परिपथ धारा को नियन्त्रित किया जाता है या परिपथ में आवश्यक वोल्टतापात कराया जाता है। ये 0.1 वॉट से 100 वॉट से उपर तक की क्षमता के बनाये जाते हैं। प्रतिरोधक निम्न लिखित प्रकार के होते है :-

१. कार्बन फिल्म प्रतिरोधक. 3 . धातु फिल्म प्रतिरोधक

2. कार्बन संयोजन प्रतिरोधक 4. तार-कुंडलित प्रतिरोधक


कार्बन फिल्म प्रतिरोधक (Carbon file resistors):- ये प्रतिरोधक एक प्रतिरोधित नली के उपर एक पतली कार्बन की परत चढा कर बनाये जाते हैं। इसके लिए नली की सतह पर सर्पाकार खाँचा काटा जाता है। ये प्रतिरोधक 1 ओहह्य से 10 मेगा ओहा, 1 वॉट की क्षमता तक उपलब्ध है। 85°C से 155°C तक के तापमान पर कार्य कर सकते हैं। चित्र 5.4 में इस प्रकार के एक प्रतिरोधक को दिखाया गया है।




कार्बन संयोजित प्रतिरोधक (Carbon composition resistors):- ये प्रतिरोधक इलैक्ट्रॉनिक्स उपकरणों में सबसे अधिक उपयोग होते है। ये आकार में छोटे होत है और सस्ते भी होते है। ये प्रतिरोधक ग्रेफाइट और सूक्ष्म कार्बन के कणों को मिलाकर, विद्युतरोधी पदार्थों के साथ मिश्रित कर बनाऐं जाते हैं। इनके सिरे ताँबे की टिन की हुई तारों से जुडे रहते हैं। चित्र 5.5 में कार्बन संयोजित प्रतिरोधक की संरचना दिखाई गई हैं। ये प्रतिरोधक 1 ओह्म से 22 मेगा ओह्म तक के मानों में 2 वॉट तक के लिए बनाये जाते है ।



धातु फिल्म प्रतिरोध (Metal film resistors) :- ये प्रतिरोधक सिरेमिक आधार पर धातु व काँच के मिश्रण का लेप बनाकर बनाये जाते हैं, सिरेमिक पर लेपित मिश्रक को पकाया जाता है। ये प्रतिरोधक 1 प्रकार के प्रतिरोधक को दिखाया गया है। ओह्य से 100 मेगा ओह्म तक 1 वॉट में उपलब्ध हैं




तार-कुण्डलित प्रतिरोधक (Wire wound resistors) :- ये प्रतिरोधक वहाँ पर प्रयोग किये जाते है जहाँ पर शक्ति व्यय 5 वॉट से अधिक होती है। चित्र 5.7 में एक विशेष प्रकार का तार-कुण्डलित प्रतिरोधक दिखाया गया है। ये प्रतिरोधक पोर्सेलिन, बैकेलाइट इत्यादि अधिक वॉट क्षमता के लिए बनाये जाते हैं। इनके प्रतिरोध का मान 1 की नली पर नाइक्रोम तार लपेट कर बनाये जाते हैं।ओहा से कई हजार ओहा तक हो सकता है।


प्रतिरोधको का वर्गीकरण :- कार्य के आधार पर प्रतिरोधको को निम्नलिखित दो वर्गों में बांटा गया है :-

1.स्थिर प्रतिरोधक

2.परिवर्तित प्रतिरोधक


स्थिर प्रतिरोधक :- जिन प्रतिरोधकों का प्रतिरोध मान अपरिवर्तित नी रहता है वे स्थितर प्रतिरोधक कहलाते है। इन प्रतिरोधकों से दो लीड बै टर्मिनलों के रूप में निकली होती है।


परिवर्तित प्रतिरोधक :- इन प्रतिरोधकों के प्रतिरोध का मान परिवर्तित हो जाता है। इनमें एक घूर्णन (Rotary) प्रकार की शाफ्ट होती है जिस पर चल कर सम्पर्क प्रतिरोधक की कार्बन सतह या तार-कुण्डलित सतह पर घूमता है और बाहरी परिपथ में परिवर्तित प्रतिरोध मान प्राप्त होता है। प्रतिरोधकों के रंगो के कोड :- व्यवसायिक रूप में प्रतिरोधकों के उपर उनके मान को दर्शाने के लिए कई रंगो की पट्टियाँ होती है। जिनके मान का निर्धारण निम्न तालिका के अनुसार किया जाता है। चित्र में एक चार रंग की पट्टी वाला प्रतिरोधक दिखाया गया है।




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